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यूपी में निषाद वोट की लड़ाई:संजय बोले- मुकेश सहनी जैसे नेता ‘जेब में नोटों की गड्डी लेकर समाज को गुमराह करने निकले मौसमी नेता’
निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी सरकार में मंत्री संजय निषाद ने सोमवार को विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुकेश सहनी पर बिना नाम लिए जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि कुछ “मौसमी नेता” अब तक तय नहीं कर पाए हैं कि मुंबई में व्यापार करेंगे, यहां-वहां घूमकर दूसरों की दरी बिछाएंगे या मछुआरा समाज के वोटों की दलाली करते रहेंगे, जैसा उन्होंने अपने राज्य में किया है। संजय निषाद ने कहा कि आजादी के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश में मछुआरा समुदाय राजनीतिक ताकत बनकर खड़ा हुआ है। अब विधानसभा चुनाव का मौसम शुरू हो चुका है। ऐसे में बाहर से आने वाले नेताओं से समाज को सावधान रहने की जरूरत है। उन्होंने बिना नाम लिए मुकेश सहनी पर निशाना साधते हुए कहा कि जो बिहार में मछुआरा समुदाय के वोटों की खरीद-बिक्री के लिए बदनाम रहा हो, जिसने वहां मछुआरों के राजनीतिक उभार को ग्रहण लगा दिया हो और जो एक विधानसभा चुनाव तक जीतने की हैसियत नहीं रखता हो, वह जेब में नोटों की गड्डी रखकर लाल टोपी और नीली वर्दी पहनकर यूपी के निषाद समाज को गुमराह करने की राजनीति करने निकला है। मछुआरा समाज पैसों पर बिकने वाली कौम नहीं संजय निषाद ने कहा कि मछुआरा समुदाय पैसों पर बिकने वाली कौम नहीं है। यूपी के मछुआरों को राजनीति सिखाने से पहले यह समझना होगा कि राजनीति उनके खून में है। उन्होंने कहा- “मछुआरा गरीब भले ही है, लेकिन गद्दार पुत्र नहीं है। अंग्रेजों और मुगलों से लड़ने वाला है। उन्हें मौत के घाट उतारने वाला, देश को आजाद कराने वाला और संविधान लिखवाने वाला है। संविधान में आरक्षण भी लिखवाने वाला है।” संजय निषाद ने कहा कि कुछ लोगों की वजह से समाज का आरक्षण लुटा और आज भी लूटा जा रहा है। आरोप लगाया कि समाज को एकजुट नहीं होने दिया जा रहा और केवट, मल्लाह, बिंद और कश्यप के नाम पर समाज में भेद पैदा किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जो दूसरे दलों से पैसा लेकर समाज में बांटता है और लोगों को “बिकाऊ” या “पीआऊ” का लेबल देता है, वह सही मायने में सन ऑफ केवट नहीं बल्कि “गद्दार पुत्र” है। गोंडा की घटना के बाद बढ़ी तल्खी संजय निषाद के इस हमले के पीछे गोंडा में निषाद समाज के विनोद कुमार सहनी की हत्या का मामला अहम माना जा रहा है। इस मामले में मुकेश सहनी की सक्रियता से संजय निषाद नाराज बताए जा रहे हैं। सहनी ने घटना के बाद निषाद समाज के बीच पहुंचकर इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की थी। लखनऊ में धरना देने सबसे परिवार को लेकर पहुंच गए। मुकेश सहनी पिछले कुछ समय से पूर्वांचल में निषाद समाज के बीच सक्रियता बढ़ा रहे हैं। वह लगातार मछुआरा समुदाय से जुड़े मुद्दों को उठाकर यूपी में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। सपा से तालमेल की चर्चा ने बढ़ाई संजय की बेचैनी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले मुकेश सहनी की सक्रियता इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उनके समाजवादी पार्टी के साथ संभावित तालमेल की चर्चा चल रही है। सहनी की पार्टी बिहार में मछुआरा और अति पिछड़ा वोट बैंक के बीच अपनी राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश करती रही है। यूपी में पूर्वांचल की बड़ी संख्या में विधानसभा सीटों पर निषाद, मल्लाह, बिंद, केवट और कश्यप समुदाय की मौजूदगी है। ऐसे में सहनी की सक्रियता निषाद पार्टी के लिए सीधे राजनीतिक चुनौती बन सकती है। संजय निषाद लंबे समय से निषाद समाज को अपने राजनीतिक आधार के तौर पर मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में बाहर से आने वाले किसी नेता की ओर से इसी वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश को वह अपने राजनीतिक प्रभाव के लिए चुनौती मान रहे हैं। निषाद वोट की लड़ाई अब आमने-सामने संजय निषाद का ताजा हमला केवल मुकेश सहनी पर व्यक्तिगत टिप्पणी तक सीमित नहीं है। इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव में निषाद वोट बैंक पर बढ़ती राजनीतिक दावेदारी साफ दिखाई दे रही है। एक तरफ संजय निषाद अपनी पार्टी को भाजपा के साथ गठबंधन में निषाद समाज की सबसे बड़ी राजनीतिक आवाज के तौर पर पेश कर रहे हैं। दूसरी तरफ मुकेश सहनी पूर्वांचल में सक्रिय होकर इसी सामाजिक आधार को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में निषाद, मल्लाह, बिंद, केवट और कश्यप समुदाय के बीच दोनों नेताओं की राजनीतिक सक्रियता बढ़ सकती है। संजय निषाद का सोमवार का बयान इसी बढ़ती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का खुला संकेत माना जा रहा है।
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