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Tata Sons शेयर लिस्टिंग पर मतभेद गहराया, Abhishek Manu Singhvi संभालेंगे Tata Trusts का पक्ष

📰 Prabhasakshi 🕐 1 min read 📅 September 20, 2026 👁 1 views
Tata Sons शेयर लिस्टिंग पर मतभेद गहराया, Abhishek Manu Singhvi संभालेंगे Tata Trusts का पक्ष
टाटा समूह के भीतर चल रहा विवाद अब कानूनी लड़ाई की तरफ बढ़ता दिख रहा है। टाटा ट्रस्ट्स ने वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी को कानूनी प्रतिनिधि के तौर पर नियुक्त किया है। यह कदम टाटा संस के बोर्ड द्वारा एन चंद्रशेखरन को लगातार पांच साल के लिए फिर से अध्यक्ष बनाए जाने के बाद उठाया गया है। चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने विरोध किया था। 17 सितंबर को हुई टाटा संस की बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन के कार्यकाल को पांच साल और बढ़ाने का प्रस्ताव बहुमत से मंजूर हुआ था। नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। इसके बाद टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले को कानूनी तौर पर अमान्य बताया। ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, इसलिए उसका रुख इस पूरे विवाद में काफी अहम माना जा रहा है। अभिषेक मनु सिंघवी ने मामले में अपनी भूमिका को लेकर कहा है कि वह इस विवाद में दुख और अफसोस के साथ शामिल हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह दिवंगत रतन टाटा के साथ करीब से काम कर चुके हैं और मौजूदा विवाद से जुड़े दोनों पक्षों के प्रमुख लोगों को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं। सिंघवी ने यह भी कहा कि शेयरधारक मालिकों के मूल अधिकारों को खत्म नहीं किया जा सकता है। सिंघवी ने टाटा ट्रस्ट्स के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि ट्रस्ट्स की बैठक बुलाने और आंतरिक स्तर पर फैसला लेने की प्रक्रिया में अचानक रोक लगाना कानूनी सवाल खड़े करता है। उन्होंने टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच सौ साल से ज्यादा पुराने संबंधों को अलग-अलग करने की संभावना को भी गंभीर मुद्दा बताया है। उनके मुताबिक, ट्रस्ट्स के फैसलों में लंबे समय से चली आ रही सहमति और विशेष अधिकारों की व्यवस्था को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच मतभेद केवल चंद्रशेखरन के कार्यकाल तक सीमित नहीं हैं। दोनों पक्ष टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने के मुद्दे पर भी अलग-अलग राय रखते हैं। टाटा संस के बोर्ड ने हाल में नियामकीय जरूरतों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया है, जबकि नोएल टाटा के नेतृत्व वाला ट्रस्ट्स पक्ष कंपनी को निजी बनाए रखने के पक्ष में रहा है। मौजूद जानकारी के अनुसार, विवाद की एक अहम वजह भारतीय रिजर्व बैंक का वह फैसला भी है, जिसमें टाटा संस को अपनी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी के पंजीकरण से बाहर निकलने की अनुमति नहीं मिली। इसके बाद कंपनी के सामने लिस्टिंग होने से जुड़ी प्रक्रिया पर आगे बढ़ने का दबाव बढ़ा है। इसी समय नेतृत्व को लेकर चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति ने विवाद को और गहरा कर दिया है। सिंघवी ने अपने बयान में टाटा-मिस्त्री मामले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी हवाला दिया है। उनका कहना है कि उस फैसले में टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका और टाटा संस के साथ उसके विशेष संबंधों को महत्व दिया गया था। हालांकि, मौजूदा विवाद में इन कानूनी दावों की अंतिम स्थिति अदालत के फैसले के बाद ही साफ होगी। बता दें कि टाटा संस के बोर्ड ने चंद्रशेखरन के अगले पांच साल के कार्यकाल को मंजूरी दे दी है, लेकिन ट्रस्ट्स की आपत्ति के बाद यह मामला अदालत तक पहुंचने की संभावना बढ़ गई है। ऐसे में आने वाले दिनों में टाटा संस के नेतृत्व, कंपनी की संभावित लिस्टिंग और टाटा समूह के शासन से जुड़े कई अहम फैसलों पर कानूनी प्रक्रिया का असर देखने को मिल सकता है।
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