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राष्ट्रपति मुर्मू के पूर्व एडीसी ऋषभ सिंह संब्याल का बड़ा खुलासा, बताया राष्ट्रपति की सुरक्षा में तैनात रहने के लिए क्या चुकाई है बड़ी कीमत

📰 Ni News India 🕐 1 min read 📅 September 11, 2026 👁 1 views
राष्ट्रपति मुर्मू के पूर्व एडीसी ऋषभ सिंह संब्याल का बड़ा खुलासा, बताया राष्ट्रपति की सुरक्षा में तैनात रहने के लिए क्या चुकाई है बड़ी कीमत
भारतीय सेना और देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद से जुड़े किस्से अक्सर आम नागरिकों के दिलों में विशेष कौतुक और सम्मान पैदा करते हैं। इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के मीडिया गलियारों तक एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है, और वह नाम है राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पूर्व एडीसी (Aide-de-Camp) ऋषभ सिंह संब्याल का। हाल ही में उन्होंने भारतीय सेना में 12 साल की शानदार और निष्कलंक सेवा देने के बाद समय से पहले यानी प्री-मेच्योर रिटायरमेंट लेकर हर किसी को चौंका दिया था। अपनी शानदार कार्यशैली और व्यक्तित्व के चलते सोशल मीडिया पर एक समय उन्हें 'नेशनल क्रश' तक की उपाधि मिल चुकी थी। सेना की नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने प्रसिद्ध पॉडकास्टकार राज शमानी के साथ एक बेहद दिलचस्प और खुला इंटरव्यू दिया है, जिसमें उन्होंने महामहिम राष्ट्रपति के साथ बिताए गए अपने कार्यकाल के अनछुए पहलुओं, अंदरूनी अनुभवों और देश सेवा के लिए उठाए गए कदमों का खुलकर जिक्र किया है। इस बातचीत के दौरान उन्होंने इस बात से भी पर्दा उठाया कि राष्ट्रपति भवन के अतिसंवेदनशील माहौल में देश के प्रथम नागरिक की सुरक्षा और सेवा की जिम्मेदारी निभाते हुए उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा व्यक्तिगत त्याग क्या किया है। शादीशुदा न होने का क्लॉज और व्यक्तिगत जिंदगी का सबसे बड़ा त्याग पॉडकास्ट के दौरान जब ऋषभ सिंह संब्याल से यह पूछा गया कि राष्ट्रपति के एडीसी के रूप में काम करने के दौरान उन्होंने व्यक्तिगत जीवन में किस प्रकार के समझौते या त्याग किए हैं, तो उन्होंने एक बहुत ही चौंकाने वाला और गंभीर खुलासा किया। उन्होंने बताया कि वह अविवाहित हैं और राष्ट्रपति का एडीसी बनने के लिए एक बहुत कड़ा नियम या क्लॉज होता है कि इस पद पर रहने वाला व्यक्ति शादीशुदा नहीं हो सकता। इस नियम के बारे में विस्तार से बताते हुए उन्होंने साझा किया कि उन्हें अपने परिवार से लंबे समय तक दूर रहना पड़ा और उनके अनुसार यही उनके जीवन का सबसे बड़ा त्याग था। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रतिष्ठित और बेहद जिम्मेदारी भरे पद पर रहते हुए आपके पास आम इंसान की तरह बाहर की दुनिया में घूमने, दोस्तों के साथ वक्त बिताने या सामान्य जिंदगी का आनंद लेने की कोई आजादी नहीं होती। यही वह कीमत है जो उन्हें देश के सर्वोच्च पद की सेवा करने के लिए चुकानी पड़ी। जब वह राष्ट्रपति भवन में अपनी सेवाएं दे रहे थे, तो उनका हर एक पल देश के संविधान, सुरक्षा और प्रोटोकॉल को समर्पित था। उन्होंने बताया कि उन्हें कभी यह अंदाजा भी नहीं था कि एडीसी जैसी कोई विधा या पद भी सेना में होता है, और शुरुआती दौर में उनकी ऐसी कोई महत्वाकांक्षा भी नहीं थी कि वह कभी राष्ट्रपति भवन तक पहुंचेंगे। चयन की अनकही कहानी और सख्त कमांडिंग ऑफिसर का वह निर्देश अपनी नियुक्ति के सफर को याद करते हुए ऋषभ सिंह संब्याल ने बताया कि वह उस समय भारत में विभिन्न देशों की सैन्य टुकड़ियों के साथ एक संयुक्त सैन्य अभ्यास में व्यस्त थे। उसी दौरान उनके कमांडिंग ऑफिसर (CO) का फोन आया और उन्हें बताया गया कि इस प्रतिष्ठित भूमिका के लिए उन्हें शॉर्टलिस्ट किया गया है। सीओ ने उनसे पूछा कि वह इस बारे में क्या सोचते हैं। इस पर ऋषभ की पहली प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक नहीं थी, बल्कि उन्होंने कहा था कि वह इस सैन्य अभ्यास को बीच में छोड़कर कहीं और नहीं जाना चाहते। हालांकि, बाद में जब उन्होंने अन्य वरिष्ठ अधिकारियों और सहयोगियों से इस बारे में सलाह ली, तो सभी ने उन्हें समझाया कि यह अनुभव उनके पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन के लिए बेहद सीखने वाला और अद्वितीय होगा। इसके बाद जब उन्होंने अपने सीओ से संपर्क किया और कहा कि वह इस चुनौती को आजमाना चाहते हैं, तो उनके सीओ ने बेहद कड़ा रुख अपनाया। सीओ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आप इसे सिर्फ 'आजमाना' नहीं चाह सकते, या तो आपको पूरी प्रतिबद्धता के साथ जाना होगा या फिर इस विचार को छोड़ना होगा। सीओ ने चेतावनी दी कि यदि वह चयन प्रक्रिया में असफल हो गए, तो उनके लिए यूनिट में वापस लौटी राहें बहुत कठिन हो जाएंगी और वह उनके प्रति बहुत सख्त हो जाएंगे। इस चेतावनी के बाद ऋषभ ने बिना कोई वक्त गंवाए अपना शत-प्रतिशत झोंक दिया और इस कठिन मुकाम को हासिल कर दिखाया। एकांत का सकारात्मक इस्तेमाल और खुद को टटोलने की अनूठी शैली देश के सबसे सुरक्षित और अति-सुरक्षित माने जाने वाले दायरे में काम करने वाले एक सैनिक के मानसिक और भावनात्मक सफर पर बात करते हुए पॉडकास्ट में यह सवाल भी उठा कि क्या उन्हें इस कठिन और एकाकी भूमिका में कभी अकेलापन महसूस हुआ। इस पर बेहद सहजता से जवाब देते हुए ऋषभ ने स्वीकार किया कि उन्हें कभी-कभार अकेलापन जरूर महसूस होता था, लेकिन उन्होंने उस अकेलेपन को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि हमेशा उसे एक सकारात्मक ऊर्जा में बदल दिया। उन्होंने बताया कि यह अकेलापन ही उन्हें अपने जीवन के बारे में, अपने सोचने के तौर-तरीकों के बारे में और अपनी खूबियों व कमियों पर दोबारा विचार करने के लिए आवश्यक जगह और समय प्रदान करता था। उन्हें हर दिन कम से कम एक घंटे के लिए पूरी तरह अकेले रहना पसंद था, जहां उनके आसपास कोई भी मौजूद न हो। उन्हें उस एक घंटे के मानसिक स्पेस की सख्त जरूरत होती थी, जिसमें वह चाहे कुछ भी न करें, बस चुपचाप बैठे रहें, लेकिन वह खालीपन उन्हें खुद का मूल्यांकन करने और आंतरिक रूप से मजबूत होने का अवसर देता था। राष्ट्रपति भवन के कड़े अनुशासन और चौबीसों घंटे की हाई-प्रोफाइल सुरक्षा ड्यूटी के बीच खुद के लिए निकाला गया यह समय उनके मानसिक संतुलन और अनुशासन की रीढ़ बना रहा। 12 साल की बेदाग सैन्य सेवा और राष्ट्रपति के सहयोगी के रूप में देश का प्रतिनिधित्व करने के बाद उनका यह अनुभव युवाओं के लिए प्रेरणा का एक ऐसा स्रोत बन गया है, जो यह सिखाता है कि देश सेवा के लिए व्यक्तिगत सुखों का त्याग किस उच्च स्तर का समर्पण मांगता है।
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