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प्रोबेशन में 70-80-90 प्रतिशत वेतन व्यवस्था निरस्त:जबलपुर हाईकोर्ट का फैसला- 2019 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को मिलेगा पूर्ण वेतन
जबलपुर हाईकोर्ट ने प्रोबेशन में 70-80-90 प्रतिशत वेतन व्यवस्था को निरस्त करते हुए मध्य प्रदेश के हजारों कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है। सुरक्षित रखे फैसले पर मंगलवार को एक्टिंग चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने कहा कि 25 नवंबर 2019 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को पूर्ण वेतन मिलेगा। कोर्ट ने शासकीय कर्मचारियों को प्रोबेशन अवधि के दौरान 70 प्रतिशत, 80 प्रतिशत और 90 प्रतिशत न्यूनतम वेतनमान दिए जाने की व्यवस्था को निरस्त कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब कर्मचारी से पद के अनुरूप पूरा कार्य लिया जा रहा है, तो उसे निर्धारित वेतनमान से कम वेतन देना उचित नहीं है। 21 कर्मचारियों ने आदेश को दी थी चुनौती स्वास्थ्य विभाग में पदस्थ 21 कर्मचारियों ने राज्य सरकार के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विवेक रूसिया एवं न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने 8 सितंबर 2026 को समान मुद्दे से संबंधित कई रिट याचिकाओं पर साझा आदेश पारित किया। एक्टिंग चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा कि 25 नवंबर 2019 के बाद नियुक्त संबंधित शासकीय कर्मचारियों को प्रोबेशन अवधि में किए गए कार्य के लिए पूर्ण वेतन का भुगतान किया जाए। साथ ही ऐसे सभी नियमों और सर्कुलर को निरस्त कर दिया है, जिनमें प्रोबेशन के प्रथम, द्वितीय और तृतीय वर्ष में क्रमशः 70%, 80% और 90% न्यूनतम वेतनमान देने का प्रावधान था। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी निर्धारित भर्ती प्रक्रिया से चयनित होकर पद पर नियुक्त होता है और प्रोबेशन अवधि में भी उससे नियमित कर्मचारी की तरह कार्य लिया जाता है, इसलिए 100 प्रतिशत कार्य लेने के बावजूद केवल प्रोबेशन के आधार पर कम वेतन देना उचित नहीं है। न्यायालय ने इस व्यवस्था को कक्षा-III एवं कक्षा-IV कर्मचारियों के प्रति भेदभावपूर्ण माना। आदेश में पूर्ण वेतन भुगतान के स्पष्ट निर्देश याचिका हेमंत हेलोंडे एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश शासन एवं अन्य में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अंशुल तिवारी एवं अधिवक्ता अभिषेक पांडेय ने पैरवी की। हाईकोर्ट के इस फैसले से प्रोबेशन अवधि में 70%, 80% और 90% वेतन प्राप्त करने वाले संबंधित शासकीय कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है। आदेश में पूर्ण वेतन भुगतान के स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार की ऐसी कोई पॉलिसी भी नहीं है कि कन्फर्मेशन के बाद उन्हें मिनिमम पे-स्केल का 30%, 20% और 10% एरियर (बकाया) दिया जाएगा, जो प्रोबेशन पीरियड के दौरान पहले, दूसरे और तीसरे साल के लिए रोका गया था। कर्मचारी उस पे-स्केल के आधार पर सैलरी पाने का हकदार है जो भर्ती नियमों में तय किया गया है। पहले, दूसरे और तीसरे साल के लिए मिनिमम पे-स्केल का 70%, 80% और 90% स्टाइपेंड के तौर पर पे-स्केल देने का कोई प्रावधान नहीं है। नियमों में तय पे-स्केल से कम सैलरी का भुगतान केवल गलत व्यवहार साबित होने पर सजा के तौर पर ही किया जा सकता है। बिना किसी ठोस वजह के सैलरी से कोई रिकवरी या कटौती नहीं की जा सकती। सजा में भी मिनिमम पे-स्केल नहीं किया जा सकता कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सजा के तौर पर भी पे-स्केल को मिनिमम पे-स्केल से कम नहीं किया जा सकता। केवल इंक्रीमेंट रोके जा सकते हैं, या कर्मचारी को निचले पे-स्केल पर वापस भेजा जा सकता है, लेकिन सज़ा के तौर पर भी पे-स्केल कम करने का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए, प्रोबेशन पीरियड में काम कर रहे कर्मचारियों को यह सोचने का कोई कारण नहीं है कि उन्हें कम सैलरी इसलिए मिल रही है क्योंकि वे पद के लिए उपयुक्त नहीं पाए गए हैं या वे रेगुलर कर्मचारी की तुलना में कम काम कर रहे हैं। इसलिए काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स द्वारा लिया गया ऐसा निर्णय, जो 25 नवंबर, 2019 के मेमो (एनेक्शर R-4) के ज़रिए जारी किया गया था, टिकने लायक नहीं है और भारत के संविधान के आर्टिकल 12 और 14 का उल्लंघन करता है, इसलिए इसे रद्द किया जाता है। संबंधित विभाग द्वारा उक्त सर्कुलर के अनुपालन में किया गया कोई भी संशोधन भी रद्द किया जाता है।
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