politics
लखनऊ में सजी 'जश्न-ए-अदब' कि महफिल:'भारत का तिरंगा न झुका है न झुकेगा' सुनकर झूमे लोग , कव्वाल अनीस बोले - कलाकारों से मोहब्बत करने वाला शहर है
लखनऊ में राविवार रात शायरों और कवियों से सजा मंच 'जश्न-ए-अदब' मुशायरा और कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ।'कल्चरल कारवां–विरासत' द्वारा आयोजित महफिल में देश के अलग अलग हिस्सों से शायर और कवियों ने हिस्सा लिया। मंच पर भारतीय संस्कृति और साहित्य का अद्भुत संगम देखने को मिला। मुख्य रूप से कव्वाल अनीस साबरी की कव्वाली पर खूब झूमे और उठकर नाचने लगे अलग अलग तरह की कविताएं गूंजी स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में सजी इस महफिल में देश भक्ति का रंग देखने को मिला। कविताओं और शायरी में देश प्रेम के साथ सेना के शौर्य को बयान किया गया। साथ ही हास्य, व्यंग्य, गजल, गीत समेत विभिन्न रंग देखने को मिले। कार्यक्रम में कविता और शायरी की परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ समाज में आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक मूल्यों को भी मजबूत करने का संदेश दिया।कव्वाल अनीस साबरी ने जब देश भक्ति के गीत गए तो लोगो झूम उठे और मंच पर आ कर नाचने लगे। 2 घंटे चली कव्वाली की महफिल प्रसिद्ध कव्वाल अनीस साबरी ने 2 घंटे तक लगातार कव्वाली और बॉलीवुड के गीत सुनाए। काली काली ज़ुल्फ़ों के फंदे न डालो , दिल गलती कर बैठा है तू बोल कफारा क्या होगा , ना छेड़ो हमें हम सताए हुए हैं- बहुत जख्म सीने पे खाए हुए हैं समेत एक दर्जन से अधिक बॉलीवुड के गीत और कव्वाली गाई । प्यार है हिंदुस्तान हमारा , भारत का तिरंगा न झुका है न झुकेगा जाब गाया तो पूरा हाल तालियों की गड़गड़हर से गूंजने लगा और सभी दर्शक खड़े होकर मंच के पास आकर नाचने लगे। लखनऊ कला का सम्मान करने वाला शहर अनीस साबरी ने बताया कि जगत 25 सालों से लगातार कव्वाली सुना रहे हैं। 7 साल की उम्र से गाना शुरू कर दिया था। मगर पूरे भारत में जितना प्यार लखनऊ में मिलता है उतना कहीं नहीं। इस शहर में कव्वाली गाने में इसलिए भी मजा आता है क्योंकि यहां के लोग शायरी को और उर्दू जुबान को बहुत अच्छे से समझते हैं। हमेशा इंतजार रहता है कि लखनऊ में प्रोग्राम कब होगा। शहर की खासियत है कि कलाकार को बहुत ध्यान से सुनते हैं उम्मीद से ज़्यादा बहुत मोहब्बत देते हैं। कवि सम्मेलन में पढ़े गए शेर... लोकेश त्रिपाठी ने कहा... चीज़ कोई नहीं, दूसरी चाहिए, बात जिसकी हुई थी, वही चाहिए आदर्श श्रीवास्तव ने पढ़ा ... पत्थर को छू के पांव से इंसान कर दिया, मुश्किल था काम, आपने आसान कर दिया। उसके लबों से कट गए मेरे सभी गिले, उसकी तपिश ने ख़ाक को लोबान कर दिया। सैय्यद नवाज़ कमर ने कहा... कब पूरे करूंगा मैं ग़ज़ल तेरे तकाज़े, होता ही नहीं ख़त्म ये दफ़्तर का तमाशा। कुँवर रंजीत चौहान ने पढ़ा... दरिया तलाशना, कहीं सहरा तलाशना, मुश्किल है खुद के जैसी ही दुनिया तलाशना।
Read full article on Bhaskar