politics
DUSU Election Result 2026: NSUI से बागी, बस कंडक्टर के बेटे... कौन हैं दीपांशु शौकीन, नंगे पैर डूसू चुनाव में लहराया परचम?
DUSU Election Result 2026: न बड़े राजनीतिक नाम का सहारा, न किसी बड़े संगठन का टिकट... फिर भी दिल्ली यूनिवर्सिटी के चुनाव में एक आम छात्र ने अपनी अलग पहचान बना ली. कभी छात्रों की सुरक्षा और हॉस्टल जैसे मुद्दों को लेकर नंगे पैर कैंपस में घूमने वाला यह चेहरा अब डूसू के उपाध्यक्ष पद तक पहुंच गया है. नाम है दीपांशु शौकीन. 2026 के डूसू चुनाव में NSUI से बागी होकर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उनकी जीत ने छात्र राजनीति में उनकी कहानी को खास बना दिया. 19 सितंबर 2026 को घोषित डूसू चुनाव परिणाम में दीपांशु शौकीन ने उपाध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की. साधारण परिवार से निकलकर DU तक का सफर दीपांशु शौकीन दिल्ली के पीरागढ़ी इलाके से आते हैं. उनके पिता राकेश कुमार दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन में कॉन्ट्रैक्ट पर कंडक्टर के तौर पर काम करते हैं. दीपांशु ने शहीद भगत सिंह कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और अब दिल्ली यूनिवर्सिटी में बुद्धिस्ट स्टडीज में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे हैं. उनकी पहचान सिर्फ एक चुनावी उम्मीदवार की नहीं रही. छात्र आवास और सुरक्षा जैसे मुद्दों को लेकर उन्होंने कैंपस में सक्रियता दिखाई. सत्य निकेतन हादसे के बाद छात्र आवास और सुरक्षा डूसू चुनाव के प्रमुख मुद्दों में भी शामिल रहे. नंगे पैर क्यों घूमते थे दीपांशु? दीपांशु ने सत्य निकेतन में पीजी बिल्डिंग हादसे के बाद विरोध के प्रतीक के तौर पर जूते-चप्पल छोड़ने का फैसला किया था. इसके बाद वह लंबे समय तक नंगे पैर कैंपस में छात्रों से जुड़े मुद्दे उठाते रहे. यही अंदाज धीरे-धीरे उनकी पहचान बन गया. NSUI से टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय उतरे दीपांशु के मुताबिक, वह करीब चार साल तक NSUI से जुड़े रहे. उनका दावा है कि संगठन ने पहले उन्हें उपाध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाने के लिए पोस्टर भी जारी किया था, लेकिन बाद में उनका टिकट बदल दिया गया. इसके बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया. यह उनके द्वारा किया गया दावा है. निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर दीपांशु ने छात्रों के बीच सीधे संपर्क को अपने अभियान का आधार बनाया. चुनाव प्रचार के दौरान उनका जोर छात्र आवास, शिक्षा और कैंपस से जुड़े मुद्दों पर रहा. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उनका अभियान महंगे प्रचार की बजाय छात्रों के साथ व्यक्तिगत संपर्क और जमीनी मुद्दों पर केंद्रित था.
Read full article on Inkhabar