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बिहार की बेटी जागृति कुमारी पूछ रही है-सौभाग्य योजना के बाद भी गांवों में अंधेरा क्यों?
जागृति कुमारी, सीतामढ़ी बिहार के गांवों में घर-घर बिजली का कनेक्शन पहुंचाना निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन क्या केवल बिजली का कनेक्शन मिल जाना ही विद्युतीकरण की सफलता है? सीतामढ़ी की बेटी जागृति कुमारी इसी सवाल को उठाते हुए पूछती हैं कि जब सरकार ने घर-घर बिजली पहुंचाने का दावा किया है, तो आज भी गांवों में रात के समय घंटों बिजली क्यों गुल हो जाती है? आखिर बिजली की पहुंच और निर्बाध आपूर्ति के बीच का यह अंतर कब खत्म होगा? ग्रामीण जीवन में बिजली अब केवल घर में रोशनी करने की सुविधा नहीं रह गई है. यह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, संचार और सुरक्षित जीवन की बुनियादी जरूरत बन चुकी है. शहरों में बिजली जाने पर लोग इन्वर्टर, बैटरी या जेनरेटर जैसे वैकल्पिक साधनों का सहारा ले लेते हैं, लेकिन गांव के गरीब परिवारों के पास अक्सर ऐसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं. उनके लिए बिजली की कटौती का अर्थ आज भी अंधेरे में कई जरूरी काम रोक देना है. सीतामढ़ी सहित बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में इस समस्या का सबसे बड़ा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है. स्कूल से लौटने के बाद बच्चों के पास पढ़ने के लिए शाम और रात का समय ही बचता है. कई परिवारों में बच्चे खेत, दुकान, पशुपालन और घरेलू काम में भी सहयोग करते हैं. ऐसे में जब वे पढ़ने बैठते हैं और बिजली चली जाती है तो उनके पास सीमित विकल्प ही बचते हैं. सवाल यह है कि क्या ऐसे वातावरण में ग्रामीण बच्चे शहरों के विद्यार्थियों के साथ शिक्षा की समान प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं? बिहार की बेटियों के लिए यह समस्या और गंभीर है. ग्रामीण किशोरियां पढ़ाई के साथ घर के कामकाज में भी योगदान देती हैं. दिनभर की जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद जब उन्हें किताब खोलने का अवसर मिलता है, तब बिजली की अनिश्चितता उनकी पढ़ाई का समय और कम कर देती है. परीक्षा के दिनों में इसका असर और ज्यादा दिखाई देता है. जिस समय एक छात्रा अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए मेहनत कर रही होती है, उसी समय बिजली कटौती उसकी तैयारी में बाधा बन सकती है. आज शिक्षा का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है. ऑनलाइन कक्षाएं, डिजिटल किताबें, वीडियो लेक्चर, परीक्षा संबंधी सामग्री और इंटरनेट आधारित अध्ययन ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए भी महत्वपूर्ण हो चुके हैं. लेकिन डिजिटल शिक्षा के लिए केवल मोबाइल फोन और इंटरनेट पर्याप्त नहीं हैं. नियमित बिजली भी उतनी ही जरूरी है. यदि बिजली बार-बार चली जाए तो डिजिटल शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद ग्रामीण विद्यार्थी उनका पूरा लाभ नहीं उठा पाते. केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2017 में प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना यानी सौभाग्य योजना शुरू की थी. योजना का उद्देश्य देश के सभी इच्छुक घरों तक बिजली कनेक्शन पहुंचाना था. आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मुफ्त बिजली कनेक्शन देने का प्रावधान किया गया था. ऐसे दुर्गम क्षेत्रों के लिए, जहां ग्रिड के माध्यम से बिजली पहुंचाना संभव नहीं था, सौर ऊर्जा आधारित स्वतंत्र प्रणालियों की भी व्यवस्था की गई थी. बिहार में सौभाग्य योजना के तहत 32,59,041 घरों का विद्युतीकरण किया गया. केंद्र सरकार के अनुसार वर्ष 2018 में बिहार को इच्छुक परिवारों के 100 प्रतिशत घरेलू विद्युतीकरण वाले राज्यों में शामिल किया गया था. यह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है. लेकिन अब बिहार के सामने बिजली व्यवस्था का अगला सवाल खड़ा है. जब घरों तक कनेक्शन पहुंच चुका है तो अब यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि इन घरों में बिजली नियमित और भरोसेमंद तरीके से उपलब्ध हो. केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में औसत बिजली आपूर्ति 2014 में 12.5 घंटे प्रतिदिन से बढ़कर 2025 में 22.6 घंटे हो गई है. यह सुधार उल्लेखनीय है, लेकिन राज्य या जिले का औसत आंकड़ा प्रत्येक गांव की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाता. कहीं बिजली की आपूर्ति बेहतर हो सकती है तो कहीं बार-बार फाल्ट, ट्रांसफॉर्मर की खराबी और लंबे समय तक बिजली बंद रहने की समस्या बनी रह सकती है. इसलिए अब बिजली व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने घरों को कनेक्शन मिला. यह भी देखा जाना चाहिए कि गांव में कितने घंटे बिजली उपलब्ध रहती है, कितनी बार आपूर्ति बाधित होती है और शिकायत दर्ज होने के बाद खराबी कितनी जल्दी दूर होती है. प्रत्येक फीडर से जुड़े गांवों का बिजली आपूर्ति रिकॉर्ड पारदर्शी तरीके से उपलब्ध कराया जा सकता है. इससे लगातार प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर वहां तकनीकी सुधार किए जा सकेंगे. बार-बार खराब होने वाले ट्रांसफॉर्मरों के मामले में भी स्थायी समाधान की जरूरत है. केवल खराबी के बाद ट्रांसफॉर्मर बदलना पर्याप्त नहीं है. उसकी क्षमता, उस पर पड़ने वाले लोड और उपभोक्ताओं की संख्या का नियमित आकलन किया जाना चाहिए. जहां जरूरत हो वहां क्षमता बढ़ाई जाए और जर्जर तारों तथा पुराने उपकरणों को बदला जाए. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में अनावश्यक बिजली कटौती को कम किया जा सकता है. जिन गांवों में ग्रिड बिजली की आपूर्ति कमजोर है, वहां वैकल्पिक ऊर्जा को भी प्राथमिकता दी जा सकती है. विद्यालयों, स्वास्थ्य केंद्रों और अन्य महत्वपूर्ण सार्वजनिक संस्थानों में सौर ऊर्जा आधारित बैकअप व्यवस्था विकसित की जा सकती है. परीक्षा के समय स्कूलों या पंचायत स्तर पर ऐसे अध्ययन केंद्र बनाए जा सकते हैं, जहां विद्यार्थियों को रात में भी पर्याप्त रोशनी उपलब्ध हो. इससे उन बच्चों को विशेष लाभ मिलेगा जिनके घरों में इन्वर्टर या अन्य वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है. सीतामढ़ी की बेटी जागृति कुमारी का सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक गांव की समस्या नहीं है. यह उन हजारों ग्रामीण बच्चों और छात्राओं की चिंता है जो बिजली के भरोसे अपनी पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी चलाते हैं. जब किसी गरीब परिवार की बच्ची पढ़ाई के लिए बिजली का इंतजार करती है, तो वहां विद्युतीकरण की सफलता का वास्तविक अर्थ सामने आता है. अब समय आ गया है कि बिजली की योजनाओं की सफलता को केवल कनेक्शन की संख्या से नहीं, बल्कि आपूर्ति की गुणवत्ता से भी मापा जाए. हर घर में मीटर और कनेक्शन होना जरूरी है, लेकिन हर जरूरत के समय बिजली उपलब्ध होना उससे भी अधिक जरूरी है. बिहार की बेटी जागृति कुमारी की आवाज में उठ रहा यह सवाल सरकार, बिजली विभाग और समाज सभी से जवाब मांगता है कि आखिर वह दिन कब आएगा जब गांव की कोई बेटी किताब लेकर बैठे और उसे रोशनी के लिए बिजली आने का इंतजार न करना पड़े? सौभाग्य योजना की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब बिहार के गांवों में बिजली केवल पहुंची हुई सुविधा नहीं, बल्कि लगातार उपलब्ध सार्वजनिक सेवा बने. जब गांव की बेटियां बिना रुकावट पढ़ सकेंगी, बच्चे परीक्षा की तैयारी कर सकेंगे और गरीब परिवारों को अंधेरे से निपटने के लिए अतिरिक्त खर्च नहीं करना पड़ेगा, तभी घर-घर बिजली पहुंचाने का उद्देश्य पूरी तरह सार्थक माना जाएगा.
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