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अमेरिकी बॉन्ड मार्केट में 19 साल का सबसे बड़ा भूचाल: यील्ड 5.34% पर, शेयर बाजार धड़ाम, भारत पर पड़ेगा भारी असर
वैश्विक वित्तीय तंत्र की रीढ़ माने जाने वाले अमेरिकी डेट बाजार से दुनिया भर के निवेशकों के लिए खतरे के सायरन बजने लगे हैं। अमेरिका के 30-वर्षीय ट्रेजरी बॉन्ड पर मिलने वाला ब्याज यानी यील्ड अचानक उछलकर इंट्रा-डे कारोबार में 5.34 प्रतिशत के स्तर को छू चुकी है। यह आंकड़ा जून 2007 के बाद का उच्चतम स्तर है, यानी लगभग 19 साल बाद निवेशकों को अमेरिकी हुकूमत को तीन दशकों के लिए कर्ज देने पर इतना भारी-भरकम मुनाफा मिल रहा है। पहली नजर में 5.34 प्रतिशत की यह संख्या साधारण लग सकती है, लेकिन जब दुनिया की सबसे सुरक्षित समझी जाने वाली सॉवरेन सिक्योरिटीज पर बिना किसी जोखिम के इतना तगड़ा रिटर्न मिलने लगे, तो इक्विटी मार्केट, कमोडिटीज और भारत जैसे उभरते बाजारों (Emerging Markets) के लिए वित्तीय स्थिरता बनाए रखना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इस रिकॉर्ड उछाल के तुरंत बाद वॉल स्ट्रीट फ्यूचर्स में भगदड़ मच गई, जहां नैस्डैक फ्यूचर्स 370 अंक से अधिक, डाउ फ्यूचर्स 160 अंक से ज्यादा और एसएंडपी फ्यूचर्स लगभग 45 अंक फिसल गए। जानिए क्या होती है बॉन्ड यील्ड और इसका शेयर बाजार से क्या है उलटा नाता आम जनता और रिटेल निवेशकों के लिए बॉन्ड यील्ड के गणित को समझना बेहद आवश्यक है। अमेरिकी सरकार अपनी विशाल कल्याणकारी योजनाओं, रक्षा बजट और बुनियादी ढांचे के खर्चों की पूर्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों से ऋण जुटाती है, जिसके बदले वह ट्रेजरी बॉन्ड जारी करती है। 30-ईयर बॉन्ड का सीधा अर्थ है कि एक निवेशक तीन दशकों की लंबी अवधि के लिए अमेरिकी सरकार को अपनी पूंजी सौंप रहा है। बॉन्ड की बाजार कीमत और उसकी यील्ड हमेशा एक तराजू के दो विपरीत सिरों की तरह काम करती हैं। जब वित्तीय बाजारों में घबराहट बढ़ती है और निवेशक पुराने बॉन्ड को बेचते हैं, तो उनकी कीमतें गिर जाती हैं और परिणामस्वरूप नए खरीदारों के लिए यील्ड यानी रिटर्न का प्रतिशत बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, यदि 100 डॉलर अंकित मूल्य वाले बॉन्ड पर 5 डॉलर का कूपन मिल रहा है और बिकवाली के चलते उसका भाव टूटकर 90 डॉलर रह जाए, तो नए खरीदार की प्रभावी यील्ड सीधे 5.5 प्रतिशत से ऊपर चली जाएगी। वर्तमान में अमेरिकी बॉन्ड बाजार में ठीक यही बिकवाली देखने को मिल रही है। आखिर 5.34 प्रतिशत तक क्यों उछली 30 साल की बॉन्ड यील्ड? ये हैं चार मुख्य वजहें अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड के इस खतरनाक स्तर पर पहुंचने के पीछे चार बड़े वैश्विक और आर्थिक कारण काम कर रहे हैं। पहला और सबसे प्रमुख कारण अमेरिका का आसमान छूता कर्ज है। वाशिंगटन का कुल राष्ट्रीय ऋण 40 ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक मुहाने पर पहुंच चुका है। जब सरकार का खर्च उसकी आमदनी से कहीं अधिक बढ़ जाता है, तो इस फिस्कल डेफिसिट को भरने के लिए अंधाधुंध नए बॉन्ड जारी किए जाते हैं। जब बाजार में बॉन्ड की आपूर्ति बेतहाशा बढ़ती है और खरीदारों की संख्या सीमित होती है, तो सरकार को निवेशकों को आकर्षित करने के लिए ज्यादा रिटर्न ऑफर करना पड़ता है। दूसरा प्रमुख ट्रिगर कच्चे तेल की कीमतों का 100 डॉलर प्रति बैरल के इर्द-गिर्द बने रहना है। मध्य-पूर्व (मिडिल ईस्ट) में सुलगते भू-राजनीतिक तनावों ने क्रूड और एलएनजी की सप्लाई चेन को बाधित किया है, जिससे ईंधन, माल ढुलाई और मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ रही है। तीसरा कारक अमेरिकी फेडरल रिजर्व (यूएस फेड) की ब्याज दर नीतियां हैं। चिपचिपी महंगाई के कारण ब्याज दरों में कटौती की संभावना कमजोर पड़ गई है, जिससे निवेशक मान रहे हैं कि 'हायर फॉर लॉन्गर' की नीति बरकरार रहेगी। चौथा कारण टर्म प्रीमियम का बढ़ना है, जहां 30 साल जैसे लंबे समय के लिए अनिश्चितताओं को देखते हुए बड़े फंड मैनेजर्स अतिरिक्त रिटर्न की मांग कर रहे हैं। महंगे कर्ज के दलदल में फंसने का खतरा: अमेरिकी इकॉनमी पर मंडराते काले बादल लॉन्ग-टर्म यील्ड के 5.34 प्रतिशत पर टिके रहने का सीधा असर यह है कि अमेरिका में समूची अर्थव्यवस्था के लिए पैसे की लागत महंगी हो चुकी है। अमेरिकी परिवारों के लिए होम लोन यानी मॉर्गेज रेट्स सीधे तौर पर 30-वर्षीय बॉन्ड यील्ड से तय होते हैं। जब मॉर्गेज रेट्स 7 से 8 प्रतिशत के पार बने रहेंगे, तो रियल एस्टेट सेक्टर में मकानों की मांग में भारी गिरावट आएगी। इसी तरह ऑटोमोबाइल लोन, क्रेडिट कार्ड उधारी और कॉरपोरेट वर्किंग कैपिटल पर ब्याज दरें बढ़ेंगी, जिससे कॉर्पोरेट कंपनियों के मुनाफे और नई नियुक्तियों पर ब्रेक लग जाएगा। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने बाजार में नकदी यानी लिक्विडिटी बढ़ाने के उद्देश्य से 6 अरब डॉलर मूल्य के पुराने लॉन्ग-टर्म बॉन्ड वापस खरीदने का कार्यक्रम भी चलाया, लेकिन 40 ट्रिलियन डॉलर के विशाल कर्ज के सामने यह उपाय ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुआ और अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां भी अमेरिका के अनियंत्रित कर्ज पर चिंता जता रही हैं। टेक शेयरों और हाई-ग्रोथ कंपनियों पर बिकवाली का साया: वैश्विक बाजारों में घबराहट शेयर बाजारों के लिए ऊंची बॉन्ड यील्ड हमेशा कड़वी दवा की तरह होती है। संस्थागत निवेशक यह सवाल उठाने लगते हैं कि जब बिना किसी क्रेडिट रिस्क के अमेरिकी ट्रेजरी पर 5.34 प्रतिशत का पक्का रिटर्न उपलब्ध है, तो फिर भारी उतार-चढ़ाव वाले शेयर बाजार में जोखिम क्यों उठाया जाए। इस परिस्थिति में सबसे ज्यादा गाज महंगे वैल्यूएशन वाले टेक स्टॉक्स, एआई आधारित स्टार्टअप्स और ग्रोथ कंपनियों पर गिरती है। इन कंपनियों का वर्तमान वैल्यूएशन उनकी भविष्य की अनुमानित आय पर निर्भर करता है, और डिस्काउंट रेट बढ़ने से उनकी प्रेजेंट वैल्यूएशन घट जाती है। इसके अतिरिक्त भारी कर्ज लेकर चलने वाली रियल एस्टेट, पावर, टेलीकॉम और यूटिलिटी कंपनियों की ब्याज लागत बढ़ने से उनके तिमाही मार्जिन सिकुड़ेंगे, जिससे वैश्विक शेयर बाजारों में तेज गिरावट और अनिश्चितता का दौर जारी रहने की संभावना है। डॉलर की बादशाहत बनाम टूटती वैश्विक करेंसी: उभरते बाजारों की बढ़ेगी परेशानी बॉन्ड यील्ड के चरम पर जाने से डॉलर इंडेक्स को अतिरिक्त मजबूती मिलती है, क्योंकि दुनिया भर से पूंजी ऊंचा रिटर्न हासिल करने के लिए अमेरिकी डॉलर की ओर भागती है। इसके विपरीत, भारत, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दोहरा दबाव पड़ता है। पहला झटका डॉलर के मुकाबले स्थानीय करेंसी के कमजोर होने से लगता है, और दूसरा झटका महंगे कच्चे तेल के भुगतान के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने के रूप में सामने आता है। हालांकि, यदि बॉन्ड यील्ड में यह तेजी अमेरिकी सरकार की राजकोषीय साख पर अविश्वास के कारण जारी रही, तो आगे चलकर डॉलर के प्रभुत्व पर भी प्रतिकूल असर देखने को मिल सकता है, मगर अल्पावधि में डॉलर की मजबूती अन्य मुद्राओं के लिए सिरदर्द बनी हुई है। गोल्ड-सिल्वर में मचेगी खींचतान: सेफ-हेवन डिमांड बनाम बॉन्ड का आकर्षण कीमती धातुओं के बाजार में बॉन्ड यील्ड का उछाल एक जटिल परिदृश्य तैयार कर रहा है। पारंपरिक रूप से सोना कोई नियमित ब्याज या डिविडेंड नहीं देता, इसलिए जब सॉवरेन बॉन्ड 5.34 प्रतिशत का कूपन देने लगें, तो निवेशक बुलियन मार्केट से पैसा निकालकर बॉन्ड में शिफ्ट करने लगते हैं। मजबूत होता डॉलर भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सोने और चांदी के भाव पर भारी दबाव डालता है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि 40 ट्रिलियन डॉलर का अमेरिकी कर्ज, वैश्विक युद्ध और वित्तीय तनाव सोने की 'सेफ हेवन' मांग को हवा दे रहे हैं। चांदी के मामले में औद्योगिक उपयोग (सोलर पैनल और सेमीकंडक्टर) के कारण अस्थिरता और ज्यादा रहेगी, जिससे कमोडिटी मार्केट में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा। भारत, दलाल स्ट्रीट और घरेलू निवेशकों के लिए क्या हैं स्पष्ट मायने भारतीय संदर्भ में अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का 19 साल के शिखर पर पहुंचना कई मोर्चों पर चुनौतियां खड़ी करता है। सबसे पहला खतरा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली के रूप में सामने आता है। भारतीय शेयर बाजार के ऊंचे वैल्यूएशन को देखते हुए विदेशी संस्थागत निवेशक मुनाफावसूली कर अपना पैसा सुरक्षित अमेरिकी ट्रेजरी में पार्क कर सकते हैं, जिससे बीएसई सेंसेक्स और एनएसई निफ्टी पर बिकवाली का दबाव गहराएगा। दूसरा असर घरेलू मुद्रा रुपये पर पड़ेगा; डॉलर मजबूत होने और विदेशी पूंजी की निकासी से रुपया डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तरों की ओर खिसक सकता है। इससे देश का आयात बिल बढ़ेगा और चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है। जिन भारतीय कंपनियों ने डॉलर डिनॉमिनेटेड विदेशी कर्ज (ECB) जुटाया है, उनकी ब्याज अदायगी का बोझ बढ़ेगा। हालांकि, आईटी और फार्मा जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर्स को कमजोर रुपये से थोड़ी राहत मिल सकती है, मगर व्यापक बाजार के लिए सतर्क रहने का समय है।
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