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तलाशी की अवैध होने से, प्राप्त सबूत का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता: हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
नई दिल्ली, 21 सितंबर 2026: पिछले कुछ सालों में न्याय की स्थापना की दिशा में कई बड़े फैसले हुए हैं। एक अल्ट्रासाउंड सेंटर की तलाशी के मामले में भी हाईकोर्ट जस्टिस मनीषा बत्रा ने न्याय की स्थापना हेतु लैंडमार्क जजमेंट दिया है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि तलाशी की प्रक्रिया अवैध थी और तलाशी लेने वाले अधिकारियों के पास में, तलाशी की अनुमति नहीं थी, तो इसके कारण तलाशी के दौरान जो एविडेंस मिले, उनका अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। तलाशी की वैधता और तलाशी के दौरान मिले साक्ष्यों की प्रासंगिकता एवं स्वीकार्यता अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। PC-PNDT Act के तहत छानबीन तलाशी और कार्रवाई का विवाद PC-PNDT Act से संबंधित यह मामला पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट के सामने प्रस्तुत हुआ था। मामला बहादुरगढ़ स्थित श्री बालाजी इमेजिंग एंड पैथोलॉजी सेंटर प्राइवेट लिमिटेड में 20 जनवरी 2014 को हुई जांच एवं छानबीन की प्रशासनिक कार्रवाई से संबंधित है। इस दौरान अधिकारियों ने, अल्ट्रासाउंड मशीन में 479 प्रक्रियाओं का रिकॉर्ड पाया गया। पैथोलॉजी सेंटर के प्रबंधन द्वारा इसको जस्टिफाई करने के लिए कोई रिकॉर्ड नहीं दिया। इसके अलावा रजिस्टर, Form-F और रेफरल स्लिप में कथित तौर पर हस्ताक्षर, मरीज एवं उसके पति से संबंधित विवरण और अन्य आवश्यक जानकारियों में कई कमियां पाई गईं। PC-PNDT Act की धारा 30 श्री बालाजी इमेजिंग एंड पैथोलॉजी सेंटर प्राइवेट लिमिटेड द्वारा इस कार्रवाई को चुनौती दी गई। उन्होंने उच्च न्यायालय को बताया कि, PC-PNDT Act की धारा 30 के तहत तलाशी के लिए जिस अनुमति की आवश्यकता होती है, तलाशी लेने वाले अधिकारियों के पास वह अनुमति नहीं थी। उन्होंने तलाशी के दौरान किसी भी स्वतंत्र गवाह को शामिल नहीं किया। मतलब कंपनी की ओर से बताया गया की तलाशी अवैध थी। अपने पक्ष के समर्थन में उन्होंने पर्याप्त एविडेंस प्रस्तुत किए। जिसके आधार पर यह स्पष्ट होता है कि, तलाशी लेने वाले अधिकारियों ने निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया। तलाशी के अवैध होने से सबूत की वैधता समाप्त नहीं हो जाती: हाईकोर्ट हाईकोर्ट जस्टिस मनीषा बत्रा ने इन दलीलों पर कहा कि यदि तलाशी की प्रक्रिया में कोई कमी थी, तो उसका प्रभाव ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के मूल्यांकन पर देखा जा सकता है। केवल तलाशी को अवैध मान लेने से उसके दौरान सामने आई सामग्री (डॉक्यूमेंट एवं अन्य सबूत) स्वतः अस्तित्वहीन नहीं हो जाती। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के डॉ. नरेश कुमार गर्ग बनाम हरियाणा राज्य सहित संबंधित फैसलों का उल्लेख करते हुए तलाशी की वैधता और तलाशी से प्राप्त सामग्री की स्वीकार्यता के बीच अंतर को रेखांकित किया। BNSS 528 के तहत याचिका से पहले पढ़िए हाईकोर्ट ने अंततः दोनों याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि जब शिकायत में ऐसे विशिष्ट आरोप मौजूद हों, जो प्रथम दृष्टया संबंधित कानून के तहत अपराध बनाते हैं, तो धारा 482 CrPC (BNSS 528) के तहत आपराधिक कार्यवाही को केवल प्रक्रियात्मक आपत्तियों के आधार पर शुरुआती चरण में समाप्त नहीं किया जा सकता। CASE: Renu Deswal v. State of Haryana & Ors. | CRM-M-5955-2022 (O&M) Connected Cases
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