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SIR पर पूर्व राजदूत Navdeep Suri के सवाल, Aadhaar Card देने पर भी मांगा नागरिकता का प्रमाण

📰 Prabhasakshi 🕐 1 min read 📅 August 23, 2026 👁 6 views
SIR पर पूर्व राजदूत Navdeep Suri के सवाल, Aadhaar Card देने पर भी मांगा नागरिकता का प्रमाण
भारत में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन के जरिए मतदाता सूची के सत्यापन और सुधार की प्रक्रिया को लेकर बहस लगातार तेज हो रही है। इसी बीच यूएई, मिस्र और ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके पूर्व राजदूत नवदीप सूरी ने पंजाब में SIR से जुड़े अपने अनुभव को लेकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। नवदीप सूरी, जो ऑस्ट्रेलिया में भारत के हाई कमिश्नर भी रह चुके हैं, ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कई पोस्ट के जरिए बताया कि वोटर आईडी और आधार कार्ड जमा करने के बावजूद उनसे भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए। SIR में नवदीप सूरी का अनुभव क्या रहा? नवदीप सूरी ने बताया कि वह पंजाब में SIR प्रक्रिया के तहत बूथ लेवल ऑफिसर के पास गए थे। उन्होंने वहां अपना वोटर आईडी और आधार कार्ड जमा किया। उनके मुताबिक, उस समय बीएलओ ने उन्हें भरोसा दिलाया कि सब कुछ ठीक है। हालांकि, बाद में एक वॉलंटियर के जरिए उन्हें जानकारी मिली कि उनकी कुछ जानकारी 2003 की SIR वोटर लिस्ट से मेल नहीं खा रही है। इसके बाद जब उन्होंने बीएलओ से संपर्क किया तो उन्हें बताया गया कि उन्हें नोटिस लेने के लिए कार्यालय आना होगा और ऐसे दस्तावेज भी प्रस्तुत करने होंगे, जिनसे उनकी भारतीय नागरिकता साबित हो सके। . @ECISVEEP I happen to have documents other than voter ID and Aadhaar card. But can’t help asking: If I have trouble establishing my citizenship after representing India in three countries, what’s the fate of the common citizen? Ease of Living, I presume! — Navdeep Suri (@navdeepsuri) August 23, 2026 इसे भी पढ़ें: भारत बनेगा पोत निर्माण का वैश्विक केंद्र, Rajnath Singh ने बंगाल में 3,500 करोड़ की योजनाओं की रखी नींव 2003 की वोटर लिस्ट में नाम नहीं होने पर क्या हुआ? नवदीप सूरी ने बताया कि उन्होंने बीएलओ को बताया कि 2003 में वह भारत में मौजूद नहीं थे। इसके बाद उनसे सबूत के तौर पर पासपोर्ट मांगा गया। पूर्व राजदूत ने कहा कि उनके पास वोटर आईडी और आधार कार्ड के अलावा भी कई दस्तावेज हैं, लेकिन उन्होंने सवाल उठाया कि अगर तीन देशों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके व्यक्ति को भी नागरिकता साबित करने में परेशानी हो रही है, तो आम नागरिकों के सामने किस तरह की मुश्किलें आ सकती हैं। उनका यह अनुभव SIR के तहत पुराने मतदाता रिकॉर्ड से लिंक करने और दस्तावेज उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को लेकर चल रही बहस को और तेज कर सकता है। बीएलओ कौन होता है? बीएलओ यानी बूथ लेवल ऑफिसर चुनाव आयोग का जमीनी स्तर पर काम करने वाला अधिकारी होता है। SIR जैसी प्रक्रिया में बीएलओ मतदाताओं से संपर्क करने, फॉर्म और दस्तावेज लेने तथा मतदाता सूची से जुड़ी जानकारी के सत्यापन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान बीएलओ आम मतदाताओं और चुनाव प्रशासन के बीच एक प्रमुख संपर्क माध्यम होता है। पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले यह पहला मामला नहीं है जब सार्वजनिक जीवन से जुड़े किसी व्यक्ति का नाम SIR से जुड़ी मतदाता सूची में नहीं मिला हो या रिकॉर्ड में किसी तरह की गड़बड़ी सामने आई हो। ऐसे मामलों में बाद में दस्तावेजों और उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच के बाद स्थिति स्पष्ट की गई और संबंधित मामलों को सुलझाया गया है। SIR का उद्देश्य भी मतदाता सूची को अपडेट करना और उसमें मौजूद गलत या अपात्र नामों को हटाना बताया गया है। बिहार से शुरू हुई थी SIR की प्रक्रिया चुनाव आयोग ने जून 2025 में बिहार से SIR प्रक्रिया की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य मतदाता सूची का व्यापक पुनरीक्षण करना था। बिहार में प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर हुए। चुनाव आयोग के आंकड़ों और बाद की प्रक्रिया में करीब 65 लाख नामों के ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं होने का मुद्दा सामने आया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने नाम हटाए जाने के कारण सार्वजनिक करने का निर्देश भी दिया था। इसके बाद SIR को लेकर दस्तावेज, नागरिकता, मतदाता अधिकार और पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हुई। इसे भी पढ़ें: Ajit Doval China Visit: ब्रिक्स समिट से पहले डोभाल का चीन दौरा, वांग यी के साथ सीमा विवाद पर होगी वार्ता 2002-2003 की पुरानी वोटर लिस्ट क्यों महत्वपूर्ण है? SIR में उन मतदाताओं के लिए पुरानी मतदाता सूची का रिकॉर्ड महत्वपूर्ण है, जिनका नाम संबंधित पुरानी सूची में मौजूद था। बिहार में 2003 की वोटर लिस्ट को पात्रता के संबंध में महत्वपूर्ण रिकॉर्ड माना गया था। जिन लोगों का नाम पुरानी सूची में नहीं था, उन्हें अपनी पात्रता साबित करने के लिए निर्धारित दस्तावेज देने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। यही व्यवस्था अब अलग-अलग राज्यों में SIR को लेकर चर्चा का अहम मुद्दा बनी हुई है। खासकर उन लोगों के लिए चुनौती सामने आती है जो 2002 या 2003 में किसी दूसरे शहर या देश में रह रहे थे या जिनके परिवार के पुराने दस्तावेज आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। 11 दस्तावेजों से शुरू हुआ विवाद, आधार भी हुआ शामिल बिहार SIR की शुरुआत में चुनाव आयोग ने 11 दस्तावेजों की सूची दी थी। इस शुरुआती सूची में आधार कार्ड शामिल नहीं था। SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आधार, वोटर आईडी और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों पर भी विचार करने को कहा था। बाद में 8 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने आधार को 12वें दस्तावेज के तौर पर स्वीकार करने का निर्देश दिया। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है, बल्कि SIR में इसे पहचान के दस्तावेज के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है। चुनाव आयोग को आधार की प्रामाणिकता की जांच करने का अधिकार भी दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता और प्रक्रिया पर क्या कहा? SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में चुनाव आयोग की शक्तियों, प्रक्रिया और मतदाता सूची से नाम हटाने के तरीके समेत कई संवैधानिक सवाल उठाए गए। अदालत के सामने यह सवाल भी रहा कि मतदाता सूची में सुधार की चुनाव आयोग की शक्ति किस सीमा तक है और यह प्रक्रिया मतदाताओं के अधिकारों को प्रभावित किए बिना किस तरह संचालित होनी चाहिए। SIR को लेकर मुख्य चिंता यह है कि मतदाता सूची में सुधार जरूरी होने के बावजूद प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें पारदर्शिता, उचित प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन हो। किसी पात्र मतदाता का नाम केवल दस्तावेजी कमी या सत्यापन की समस्या के कारण बाहर न हो, यह इस पूरी बहस का महत्वपूर्ण पहलू है। आम मतदाताओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है SIR? SIR सीधे मतदाता सूची से जुड़ा है और इसलिए इसका असर चुनाव में वोट डालने के अधिकार पर पड़ सकता है। पुरानी मतदाता सूची से रिकॉर्ड मिलान, दस्तावेजों की उपलब्धता और बीएलओ के स्तर पर सत्यापन जैसी प्रक्रियाएं आम मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण हो जाती हैं। नवदीप सूरी का मामला इसी सवाल को सामने लाता है कि अगर एक पूर्व राजदूत और वरिष्ठ सार्वजनिक व्यक्ति को भी SIR सत्यापन के दौरान अतिरिक्त दस्तावेज देने की जरूरत पड़ रही है, तो ऐसे मतदाताओं के लिए प्रक्रिया कितनी आसान और स्पष्ट होगी जिनके पास पुराने रिकॉर्ड या दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।
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