politics
*शाकाहार-मांसाहार की बहस बेतुकी:गवर्नेंस और नीति-निर्धारण में जनसांख्यिकीय आंकड़ों की भूमिका*
उर्मिलेश शाकाहार-मांसाहार की बहस बेतुकी है। ऐसी बेमतलब बहसें आमतौर पर देश के हिंदी-भाषी राज्यों के कुछ खास वर्ण-वर्ग के अपेक्षाकृत समृद्ध, कर्मकांड को पसंद करने वाले और शारीरिक श्रम से दूर रहने वाले लोग ही चलाते हैं। मकसद होता है, अपने सामाजिक-आर्थिक हितों का संरक्षण और आम लोगों के बीच अवैज्ञानिक, अतार्किक और मूर्खतापूर्ण [...]
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