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चुनावी शुचिता, आंतरिक असहमति और 'वोट चोरी' का नैरेटिव
इस पूरे घटनाक्रम के दो पहलू हैं। सकारात्मक पहलू यह है कि यह प्रकरण चुनाव आयोग के भीतर 'चेक्स एंड बैलेंसेज' (नियंत्रण और संतुलन) की व्यवस्था को जीवित दिखाता है। यदि दो आयुक्त खुले तौर पर नियमों के विचलन पर प्रश्न उठा रहे हैं, तो यह साबित करता है कि आयोग के भीतर पूर्णतः एकतरफा व्यवस्था लागू करना आसान नहीं है और संस्थागत ईमानदारी अभी भी मौजूद है।
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