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बाणसागर विस्थापितों को बेदखली और केस दर्ज करने की धमकी:8 महीने से पुनर्वास के लिए भटक रहे, फिर से कलेक्टर कार्यालय पहुंचे
कटनी जिले के विजयराघवगढ़ तहसील में बाणसागर डूब क्षेत्र से विस्थापित हुए सैकड़ों भूमिहीन ग्रामीण गुरुवार को कलेक्टर कार्यालय पहुंचे। उन्होंने नारेबाजी करते हुए कलेक्टर के नाम संयुक्त कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। ये ग्रामीण अपनी जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा के साथ घर की मांग कर रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया कि बाणसागर जल विद्युत और सिंचाई परियोजना की वजह से वे पूरी तरह बेघर और भूमिहीन हो गए हैं। करीब 500 विस्थापित परिवार अपनी और अपने बच्चों की जान बचाने के लिए विजयराघवगढ़ तहसील के पिपरा, बम्होरी और कुसमा गांवों की वन भूमि (कक्ष क्रमांक 16, बीट गुडेहा, परिक्षेत्र बड़वारा) में रह रहे हैं। उन्होंने यहां कच्ची झुग्गी-झोपड़ियां बनाई हैं। पुनर्वास की नहीं हो पाई कोई व्यवस्था ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने यह कदम मजबूरी में उठाया है। इससे पहले वे अपनी मांगों को लेकर 70 किलोमीटर पैदल चलकर कलेक्टर और वन मंडलाधिकारी (डीएफओ) कटनी के पास पहुंचे थे। उस समय विजयराघवगढ़ एसडीएम को भी लिखित ज्ञापन दिया गया था। प्रशासन ने तब बड़े अधिकारियों से बात कर जल्द पुनर्वास और जमीन देने का भरोसा दिया था। 8 महीने से सैकड़ों आदिवासी भटकने को मजबूर विस्थापितों ने आरोप लगाया कि वे करीब 8 महीने से बिना किसी विवाद के शांतिपूर्वक वहां रह रहे थे। इसकी जानकारी स्थानीय रेंजर को भी थी। हालांकि, हाल ही में कुछ स्थानीय लोगों की शिकायत के बाद प्रशासन का रवैया बदल गया। ग्रामीणों के अनुसार, 22 सितंबर 2026 को थाना प्रभारी विजयराघवगढ़ और रेंजर ने उन्हें थाने बुलाया। आरोप है कि पहले उनसे आधार कार्ड और मोबाइल नंबर लेकर रजिस्टर में दर्ज किए गए। बाद में उन्हें वन भूमि से तुरंत बेदखल होने और झोपड़ियां गिराकर केस दर्ज करने की धमकी दी गई। क्या मांग की गई? उन्होंने मांग की है कि पिपरा, बम्होरी, कुसमा (कक्ष क्रमांक 16, बीट गुडेहा) और आसपास के इलाकों में रह रहे बाणसागर विस्थापितों के खिलाफ बेदखली, अतिक्रमण धारा या मुकदमे की कार्रवाई पर तुरंत रोक लगाई जाए। आदिवासियों ने कहा कि मड़ैया और झोपड़ियों को न गिराया जाए। यदि वन भूमि पर अधिकार देना संभव न हो, तो जिले के भीतर ही किसी अन्य स्थान पर राजस्व भूमि आवंटित कर सभी 500 परिवारों को स्थायी रूप से बसाया जाए। उद्योगों को आसानी दे रहे जमीन, हमें क्यों नहीं? ज्ञापन देने आए आदिवासी रूप सिंह, नंदलाल कोल, राजा कोल, चंद्रावती सिंह और छोटू कोल ने कहा कि जब बड़े-बड़े उद्योगों, खदानों और फैक्ट्रियों को लीज पर सैकड़ों एकड़ वन भूमि सौंपी जा रही है और सुप्रीम कोर्ट से लाखों पेड़ काटने की अनुमति मिल जाती है, तब पर्यावरण का नुकसान नहीं होता? इस देश के गरीब आदिवासियों को अपनी जान बचाने के लिए दो गज जमीन का भी अधिकार नहीं है, जंगल में जानवरों, लकड़ी ठेकेदारों और कोयला-खनिज निकालने वाली कंपनियों का तो अधिकार है, लेकिन जल-जंगल-जमीन के असली संरक्षक आदिवासियों को बेघर किया जा रहा है।
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