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बालजीवन परिवार में शेयर से ब्रांड तक विवाद:2600 शेयरों के ट्रांसफर से नई कंपनी तक पहुंचा मामला, दो मुकदमे दर्ज, कंपनी के शेयरों में हेराफेरी और ‘बालजीवन’ नाम के इस्तेमाल के
शहर की पहचान बन चुकी आयुर्वेदिक दवा कंपनी बालजीवन मेडिसंस और इससे जुड़े संस्थापक परिवार का पुराना विवाद अब दो अलग मुकदमों के रूप में सामने आया है। एक मामले में कंपनी के संस्थापक श्याम सुंदर अग्रवाल के नाम दर्ज 2600 शेयरों को कथित तौर पर परिवार के कुछ सदस्यों के नाम ट्रांसफर कराने का आरोप है। दूसरे मामले में ‘बालजीवन’ नाम और उससे जुड़ी गुडविल के इस्तेमाल को लेकर विवाद है। दोनों मामलों में संस्थापक परिवार से जुड़े रोहन अग्रवाल की शिकायत पर कोर्ट के आदेश से बन्नादेवी थाने में मुकदमे दर्ज किए गए हैं। एक एफआईआर में सौरभ अग्रवाल और रिचा अग्रवाल समेत अन्य लोगों पर आरोप हैं, जबकि दूसरी में सौरभ अग्रवाल, आनंद प्रकाश और शुभाशीष चक्रवर्ती को नामजद किया गया है। पुलिस दोनों मामलों में दस्तावेजों और आरोपों की जांच कर रही है। पहले समझिए- विवाद की जड़ कहां से शुरू हुई रोहन के मुताबिक, उनके दादा श्याम सुंदर अग्रवाल बाल जीवन मेडिसंस, सारसौल के संस्थापक थे। कंपनी में उनके नाम 2600 शेयर दर्ज थे। 23 फरवरी 1999 को उनकी मृत्यु के बाद इन शेयरों पर परिवार के पांच पुत्रों और पांच पुत्रियों का कानूनी अधिकार बना। शिकायतकर्ता का आरोप है कि 15 जनवरी 2009 को परिवार के अन्य वारिसों की जानकारी और सहमति के बिना संस्थापक के तीन पुत्रों शांति स्वरूप अग्रवाल, ज्योति स्वरूप अग्रवाल और प्रदीप अग्रवाल ने सभी 2600 शेयर अपने नाम ट्रांसफर करा लिए। बाद में इस संबंध में सिविल कोर्ट से डिक्री भी कराई गई। रोहन का दावा है कि शेयर ट्रांसफर के लिए कंपनी रिकॉर्ड में गलत एंट्री की गई। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया में तत्कालीन चार्टर्ड अकाउंटेंट की भूमिका की जांच की मांग भी की है। शिकायत के अनुसार, बाद में इन्हीं शेयरों के आधार पर सौरभ और रिचा अग्रवाल कंपनी के शेयरधारक और निदेशक बने। दूसरा विवाद- ‘बालजीवन’ नाम किसका? इसी परिवार में दूसरा विवाद कंपनी के शेयरों से आगे बढ़कर ब्रांड नाम तक पहुंच गया। रोहन ने आरोप लगाया कि परिवार की संपत्ति और ‘बालजीवन’ नाम के अधिकार को लेकर सिविल कोर्ट में मुकदमा चला था, जिसका फैसला 28 जनवरी 2012 को हुआ। रोहन का दावा है कि अदालत ने ‘बालजीवन’ शब्द, नाम और उससे जुड़ी गुडविल के इस्तेमाल को लेकर अधिकार निर्धारित किए थे। शिकायत के मुताबिक, इसके बावजूद सौरभ अग्रवाल ने आनंद प्रकाश और शुभाशीष चक्रवर्ती के साथ मिलकर बालजीवन हर्बल केयर प्राइवेट लिमिटेड नाम से नई कंपनी गठित कर ली। इस कंपनी का पंजीकरण वर्ष 2023 में होने की बात शिकायत में कही गई है। आरोप है कि नई कंपनी में बाहरी लोगों को शामिल कर पुराने ‘बालजीवन’ नाम की कारोबारी पहचान और प्रतिष्ठा का फायदा उठाया गया। शिकायतकर्ता ने इसे अदालत के आदेश की अवहेलना बताते हुए कार्रवाई की मांग की है। दवा लाइसेंस में भी उठाए सवाल शेयर विवाद वाली एफआईआर में कंपनी के औषधि निर्माण लाइसेंस को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। रोहन का आरोप है कि कंपनी के तकनीकी स्टाफ के रिकॉर्ड में वैद्य वेदराम सिंह का नाम दर्ज है, जबकि उनकी मृत्यु वर्ष 2009 में हो चुकी थी। शिकायत के मुताबिक, इसके बावजूद उनके नाम का इस्तेमाल फार्म 25-डी में करते हुए लाइसेंस का नवीनीकरण कराया गया। एक अन्य वैद्य भानु प्रताप सिंह के बारे में भी दावा किया गया है कि उन्होंने कई वर्ष पहले कंपनी छोड़ दी थी, लेकिन उन्हें रिकॉर्ड में कर्मचारी के तौर पर दर्शाया जा रहा है। रोहन ने आरोप लगाया है कि इन रिकॉर्ड के आधार पर कैप्सूल समेत कई आयुर्वेदिक उत्पाद बनाए जा रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि पुलिस जांच के बाद ही होगी। सौरभ का पक्ष- सिविल विवाद को क्रिमिनल केस बनाया सौरभ अग्रवाल ने आरोपों को खारिज करते हुए आरोप लगाया है कि पुरानी पारिवारिक रंजिश और कारोबारी विवाद के चलते उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाकर दबाव बनाया जा रहा है। उनका दावा है कि बाल जीवन मेडिसिंस की दवाओं के सैंपल फेल होने और आयुष विभाग की सीलिंग कार्रवाई से ध्यान हटाने के लिए उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। साथ ही बीमा नगर स्थित पारिवारिक जमीन को बेचकर उसका हिस्सा न देने की नीयत से कथित फर्जी दस्तावेज तैयार कर सिविल विवाद को आपराधिक मामले का रूप देने का आरोप लगाया है। यह भी आरोप है कि उनके साथ काम करने वाले कर्मचारियों को मुकदमों में फंसाने की योजना बनाई जा रही है। लगातार दबाव और मुकदमों के चलते उसने मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए अपने और कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर आशंका जताई है। उन्होंने भविष्य में किसी अप्रिय घटना की स्थिति में रोहन अग्रवाल और उनके परिजनों की भूमिका की आशंका जताते हुए मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। पुलिस के सामने अब दस्तावेजों की जांच सबसे अहम दोनों मुकदमों में पुलिस के सामने कंपनी के पुराने रिकॉर्ड, शेयर ट्रांसफर से जुड़े दस्तावेज, सिविल कोर्ट के आदेश, कंपनी पंजीकरण संबंधी कागजात और औषधि लाइसेंस के रिकॉर्ड की जांच अहम होगी। यह भी देखा जाएगा कि 2600 शेयर किस प्रक्रिया से ट्रांसफर हुए और 2023 में गठित नई कंपनी के नाम को लेकर 2012 के अदालत के आदेश का क्या प्रभाव है। बन्नादेवी इंस्पेक्टर हरिभान सिंह राठौड़ के अनुसार, दोनों मामलों में मुकदमे दर्ज कर जांच की जा रही है। जांच में सामने आने वाले दस्तावेज और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।
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