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44 साल पुराने हत्या-डकैती केस में आरोपी बरी:ट्रायल कोर्ट से 10 साल की सजा हुई थी, हाईकोर्ट बोला पुख्ता सबूत नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 44 साल पुराने हत्या और डकैती से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी सत्तू को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि हत्या से पहले पांच या उससे अधिक लोगों का उद्देश्य डकैती करना था। केवल मृतक की बंदूक और कारतूस की पेटी छीन लिए जाने से घटना को डकैती के दौरान हत्या नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति समित गोपाल ने यह फैसला 25 अगस्त 2026 को कृष्ण पाल व अन्य की आपराधिक अपील पर सुनाया। जानिये क्या है मामला मामला 30 दिसंबर 1981 का है। एटा जिले के पटियाली थाना क्षेत्र में अतार सिंह अपने बेटे धीरेंद्र पाल सिंह, भाई रघुनाथ सिंह और अन्य लोगों के साथ बस से उतरकर पैदल गांव जा रहे थे। आरोप था कि चेहका गांव के पास महावीरा अपने साथियों के साथ वहां पहुंचा और अतार सिंह पर फायरिंग कर दी। अतार सिंह ने भी अपनी लाइसेंसी बंदूक से जवाबी फायरिंग की, जिसमें दो हमलावरों के घायल होने की बात कही गई। इसके बाद आरोपियों की ओर से की गई फायरिंग में अतार सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए और उनकी मौत हो गई। आरोप था कि चंद्रपाल ने मृतक की बंदूक और कारतूसों की पेटी छीन ली। 10 साल की सजा सुनाई गई घटना के संबंध में पटियाली थाने में हत्या, डकैती समेत विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया। ट्रायल कोर्ट ने 2 नवंबर 1982 को कृष्ण पाल, सत्तू, रामलाल, चंद्रपाल और मुंशी सिंह को आईपीसी की धारा 396 के तहत दोषी ठहराते हुए दस वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। अपील लंबित रहने के दौरान चार आरोपियों की मृत्यु हो गई, जिसके बाद अब केवल सत्तू की अपील पर सुनवाई हुई। डकैती के लिए हत्या साबित नहीं हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 396 के तहत दोषसिद्धि के लिए पहले यह साबित करना जरूरी है कि पांच या उससे अधिक लोगों ने मिलकर डकैती की और डकैती करते समय हत्या हुई। इस मामले में अभियोजन की अपनी कहानी के अनुसार दोनों पक्षों की अचानक सड़क पर मुलाकात हुई थी और पुरानी दुश्मनी के कारण महावीरा ने अतार सिंह पर गोली चलाई थी। इसके बाद दोनों ओर से फायरिंग हुई और अतार सिंह की मौत हो गई। रिकॉर्ड पर कोई महत्वपूर्ण साक्ष्य नहीं कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि महावीरा का गिरोह डकैतों का गिरोह था और उसमें अपीलकर्ता सत्तू भी शामिल था। सत्तू के कब्जे या उसकी निशानदेही पर कोई आपत्तिजनक वस्तु भी बरामद नहीं हुई। अदालत ने माना कि मृतक की बंदूक और कारतूस बाद में छीने जाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि डकैती करना आरोपियों का प्रारंभिक उद्देश्य था। हाईकोर्ट ने धारा 396 के तहत सत्तू की दोषसिद्धि को निरस्त करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया।
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